"आपातकाल में एक युवा स्वयंसेवक की यात्रा": प्रधानमंत्री मोदी ने ‘द इमरजेंसी डायरीज़’ पुस्तक का किया परिचय, आज अमित शाह करेंगे विमोचन
नई दिल्ली।
आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘द इमरजेंसी डायरीज़’ का परिचय दिया, जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों और उस दौर में लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष को सामने लाती है। इस पुस्तक को ब्लूकाफ्ट डिजिटल फाउंडेशन ने प्रस्तुत किया है और इसका विमोचन आज शाम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "जब आपातकाल लगाया गया था, मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक युवा प्रचारक था। उस समय का विरोध आंदोलन मेरे लिए एक सीखने का अनुभव था, जिसने लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्ता को मेरे भीतर गहराई से स्थापित किया। इस संघर्ष ने मुझे विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के साथ मिलकर कार्य करने का अवसर दिया।"
पुस्तक में उन सहयोगियों के प्रत्यक्ष अनुभवों को स्थान दिया गया है जिन्होंने उस कालखंड में मोदी के साथ कार्य किया था। साथ ही, इसमें दुर्लभ अभिलेखीय सामग्री भी शामिल की गई है। पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा ने इस पुस्तक की भूमिका लिखी है, जो स्वयं आपातकाल विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे हैं।
लोकतंत्र के अंधकारमय दिनों की दास्तान
प्रधानमंत्री ने कहा कि "आपातकाल की यादें आज भी सिहरन पैदा करती हैं। यह पुस्तक न सिर्फ मेरे व्यक्तिगत अनुभवों का दस्तावेज़ है, बल्कि उन लाखों भारतीयों को श्रद्धांजलि है जिन्होंने उस दौर में तानाशाही के विरुद्ध आवाज़ उठाई।" उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने परिवार के आपातकाल से जुड़े अनुभव सोशल मीडिया पर साझा करें, ताकि आने वाली पीढ़ी इस "संविधान की हत्या" के दौर को ठीक से समझ सके।
ब्लूकाफ्ट फाउंडेशन ने कहा कि यह पुस्तक नरेन्द्र मोदी के प्रारंभिक संघर्षों और लोकतंत्र के लिए उनकी निष्ठा को दर्शाती है। "यह एक ऐसे नेता की गाथा है, जिसने कभी दबाव में झुकना नहीं सीखा और लोकतंत्र की रक्षा को अपना जीवन ध्येय बना लिया," फाउंडेशन ने कहा।
आपातकाल: संविधान पर हमला
प्रधानमंत्री ने एक अलग संदेश में कहा, “25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दिन था। इस दिन को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में याद किया जाना चाहिए। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संविधान को ताक पर रख दिया, मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस की स्वतंत्रता खत्म कर दी गई, और हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं, छात्रों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया।”
उन्होंने कहा कि “कोई भी भारतीय उस 42वें संविधान संशोधन को नहीं भूलेगा, जिसके माध्यम से संसद की आवाज़ दबाई गई और न्यायपालिका को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए। सबसे अधिक अत्याचार गरीबों, वंचितों और पिछड़े वर्गों पर हुआ।”
लोकतंत्र के लिए संघर्ष की विरासत
प्रधानमंत्री ने देशवासियों को उस समय के संघर्ष की याद दिलाते हुए कहा, “वह आंदोलन सिर्फ एक राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों की रक्षा का महाअभियान था। यह संघर्ष तब तक चला जब तक कांग्रेस सरकार को चुनाव कराने पर मजबूर नहीं होना पड़ा, जिसमें उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।”
उन्होंने अंत में कहा, “हम संविधान की भावना को सशक्त बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं और विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ते रहेंगे।”
पृष्ठभूमि:
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा की थी। इसका औचित्य राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक तेल संकट के कारण बिगड़ी अर्थव्यवस्था और देशव्यापी हड़तालों को बताया गया। इस 21 महीने के आपातकाल ने भारतीय राजनीति की दिशा को स्थायी रूप से प्रभावित किया। 1977 में हुए आम चुनावों में जनता पार्टी के नेतृत्व में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।
